कोनों-कुनबों
में उजाला भरता दीया
रौशनी का कोई मजहब नहीं होता, त्योहारों की कोई जात नहीं होती। भारत जैसे देश में तो त्योहारों की
खूबसूरती ही इनको साथ मिल कर मनाने से है, क्योंकि रौशनी के
इस उत्सव दीवाली में बंदिशें नहीं, खुशियां बांटी जाती है। फिर
कौन किस मजहब, पंथ का है इससे फर्क नहीं पड़ता। यह बात अलग है
कि सियासत की जहर भरी हवा में माहौल कुछ देर के लिए कुछ धुंध से जरूर भर जाता है,
लेकिन लाठी की मार से पानी कभी अलग हुआ करता है। भारतीय परिवेश पर
भी यही बात पूरी तरह लागू होती है। यहां मौत का मातम हो या खुशियों का उत्सव सब
मिल कर साथ मनाते आए हैं। कभी धर्म, मजहब बंदिश की तरह आड़े
नहीं आते। यही वजह है कि चाहे इतिहास के पन्ने पलटें या आज पर नजर डालें यही नजर
आता है कि दीवाली के दीयों में कुछ रौशनी उन घरों की भी शामिल होती है जिनके लिए
श्रीराम भले ही ईश्वर के अवतार न हों, लेकिन एक अहम शख़्सियत
जरूर हैं और मुस्लिम प्रजा उन्हें अपने राजा के तौर पर याद करके उनके स्वागत में
चरागा करती आई है। दरअसल, यहां त्योहारों में शामिल होना एक
परंपरा है और तहजीब का हिस्सा भी। यही वजह है कि यहां त्योहारों की खुशियां भी मिल
कर ही मुकम्मल मानी जाती हैं।
उर्दू की मिठास से लबरेज रामायण की कथा
को 1935 में मौलवी बादशाह हुसैन राणा लखनवी ने आसान शब्दों के साथ छंद में लिखा
था। आज भी इस उर्दू रामायण को सुनने हर साल दूर-दूर से लोग बीकानेर पहुंचते हैं। दीवाली
के दीयों की जगमग के बीच उर्दू की नफासत के साथ इस रामायण को सुनने का अपना ही मजा
है।
किस कदर पुरलुत्फ है अंदाज तुलसी दास का,
यह नमूना है गुसाई के लतीफ अंदाज का,
नक्शा रामायण में किस खूबी से खींचा,
राम के चौदह साल वनवास का।
तुलसी दास की रामायण से अलग उर्दू रामायण
की इन पंक्तियों से हिंदुस्तान के वजूद की एक ऐसी सच्ची तस्वीर झांकती दिखती है
जिसमें हिंदू-मुस्लिम एकता के खूबसूरत रंग नजर आते हैं। इसे एक अच्छा संकेत कह
सकते हैं कि हर दीवाली पर इस रामायण को सुनने का एक रिवाज भी बन गया है। आज भी जब रौशनी
के इस पर्व पर रौशनी मेहमान बन कर जगमगाती है, तो इसके लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता,
अपना-पराया नहीं होता। यह खुशियों की सूरत लिए दीए की तरह टिमटिमाती
है। कहा जाता है कि मुगल शासक बाबर ने भी दीवाली को ‘एक खुशी
का मौका’ के तौर पर न सिर्फ मान्यता दी थी, बल्कि वह दीवाली के उत्सव में शामिल भी होते थे। आगे चलकर यही एक परंपरा
बन गई और हुमायूं से लेकर बहादुर शाह जफर तक यह परंपरा बनी रही। यही वजह है कि
रौशनी की यह बेला कभी कलमकारों की कलम का विषय बनी है, तो
कभी शायरों के कलाम में इसकी अहमियत नजर आई है। रौशनी के इस त्योहार की जगमगाहट से
न तो नजीर ही बच सके और न ही जोश मलीहाबादी। जोश ने अपनी आत्मकथा में दीवाली के
त्योहार की जो मंजरकशी की है, वह बताती है कि उनके समय में
भी दीवाली किसी एक दायरे में कैद न होकर मुस्लिमों के आंगन तक दीयों के रूप में
जगमगाती नजर आती रही है। ऐसे में वे अपनी आत्मकथा में भी इसका जिक्र करना भूले
नहीं हैं। वह लिखते हैं, ‘बचपन में किस तरह दीवाली में
धूम-धड़ाका हुआ करता था। गट्टे और मिठाई के हसीन और बारीक खिलौने बड़े सलीके के साथ
हर तरफ चुन दिये जाते थे। शाम होते ही पहले उन घरौंदों और फिर पूरे मकान में चराग
जलाए जाते थे और हर कोना जगमगाने लगता था और ऐन उसी वक्त जबकि चरागों की पलकें
झपकाती रौशनी में खालिस घी के चरागों के नाचते धुएं की खुश्बू हवा में तैरने लगती
थी। उसी वक्त हमारे बड़े दालान में ढोलक पर थाप पड़ती और डोमनियां, मिरासें गाना शुरू कर दिया करती थीं, ‘आई दीवाली,
आई दीवाली, मदमाती यौवन वाली। आई दीवाली,
आई दीवाली।’
18वीं सदी के मशहूर शायर नजीर अकबराबादी ने
शायरी की आम परंपरा से अलग आसान शब्दों में हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने वाली
नज्में कही। उन्होंने आम आदमी को अपनी नज्मों का विषय बनाया। फिर चाहे मौसम की बात
हो या होली, दीवाली जैसे त्योहारों की। उन्होंने इन्हें
दिलचस्प अंदाज में कलमबंद किया। दीवाली की रौनक को उन्होंने कुछ इस तरह शब्दों में
पिरोया-
हर इक मकां में जला फिर दीया दीवाली का,
हर इक तरफ को उजाला हुआ दीवाली का,
सभी के दिल में समा भा गया दीवाली का,
किसी के दिल को मजा खुश लगा दीवाली का,
अजब बहार का है दिन बना दीवाली का।।
आजादी की मुहिम के गवाह और गंगा-जमुनी
तहजीब का केंद्र रहे कानपुर में आज भी परंपरा के तौर पर हिंदुओं के साथ मुसलमान भी
दीवाली के दीयों से पूरे इलाके को रौशन करते हैं। 1876 में इस परंपरा की
नींव दरअसल अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह जताने के तौर पर पड़ी थी। तब दीवाली में
मुस्लिमों ने हिंदुओं के साथ मिल कर दीए जलाए थे और जंग का ऐलान किया था। तब से यह
आज तक एक परंपरा के तौर पर कायम है। दरअसल, दीवाली खुशियों
का एक ऐसा उत्सव है जिसमें दीयों की जगमग में अंधेरे के अंत का संदेश है, तो खुशियों की मिठास में कड़ुवाहट को जगह न दिए जाने का सबक भी।
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