Wednesday, 30 October 2019

‘मेरे रश्के-कमर...’ तीस साल बाद भी जादू बरकरार

‘मेरे रश्के-कमर...’ तीस साल बाद भी जादू बरकरार
मेरे रश्के-कमर...गीत आज लोकप्रियता के पायदान पर है तो इसकी वजह है इसका सूफी संगीत   दिल की गहराइयों को छूकर रूह तक महसूस होने वाले सूफी संगीत की यह खासियत ही है कि इसको सुनने वाला मदमस्त होकर झूमने लगता है, बल्कि यह कहा जाए कि इसमें दीवाना होकर बंदा अपने रब को करीब से महसूस करता है तो गलत नहीं होगा। फिल्म बादशाहोका यह गीत जो आज लोकप्रियता के परचम लहरा रहा है, इसे 1988 में उस्ताद नुसरत फतेह अली खां की गायी एक कव्वाल        की तर्ज पर बनाया गया है। तीस साल पहले फना बुलंद शहरी की लिखी इस कव्वाली की मकबूलियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तब से लेकर आज तक कितने ही गायकों ने इसे अपनी आवाज से सजाया है और हर बार श्रोताओं की वाहवाही लूटी है। दरअसल, सूफी परंपरा में संगीत भी इबादत का एक अंग है और कव्वाली इसकी एक खास विधा। कभी दरगाहों और खानकाहों में सूफियों की सजने वाली समांकी महफिलों का ही बदला हुआ एक रूप कही जा सकती है कव्वाली। इसका ताल्लुक रूहानियत से है। यही वजह है कि आज भी दरगाहों के आंगन से लेकर सुर की महफ़िलों तक जब सूफी संगीत के सुर फूटते हैं तो सारा आलम दीवाना नजर आता है।
सूफी संगीत को समझने के लिए उर्दू, फारसी साहित्य को समझना एक जरूरी शर्त है, मगर जहां संगीत दिलों को जोड़ने के एक अहम जरिये के तौर पर हो वहां इस तरह के नियम लागू नहीं होते। यही वजह है कि कभी सूफियों ने अमन और सच्चाई का पैगाम लोगों तक पहुंचाने के लिए इस विधा का सहारा लिया था, तो वहीं आज सूफी संगीत की गूंज उन यूरोपीय देशों तक है जहां के लोग भले ही इसके साहित्य से अनभिज्ञ हों, इसके बावजूद उनके दिलों का राबता कव्वाली के सुरों से जुड़कर सूफी संगीत की धुन से जुड़ जाता है और वे मदमस्त होकर झूमने लगते हैं। यही इस संगीत की खासियत भी रही है। कव्वाली शब्द कौल से बना है। इसके मायने हैं, बार-बार दोहराना। इसे सुनने वाले एक सुकून महसूस करते हैं और कव्वाली में बार-बार दोहराये जाने वाले शब्दों को सुनकर श्रोता एक तरह से आध्यात्मिकता में खो जाते हैं। दरअसल, कव्वाली का मकसद भी यही होता है। कव्वाली को इबादत से जोड़कर देखा जाता रहा है। यहां तक कि इसमें मंच पर बैठने वाले कव्वालों के बैठने का भी एक खास क्रम होता है। इसमें अदब और वरिष्ठता का ख्याल रखा जाता है। यहां तक कि इसे गाने से पहले वुजू भी किया जाता है। पारंपरिक कव्वाली से पहले हम्द, नात और मनकबत के साथ गजल भी पेश की जाती है। इसका ताल्लुक रूह से है और जब कव्वाली रूहानियत से जुड़ जाती है तो दिलों का संबंध सीधे ईश्वरीय दुनिया से हो जाता है।
फिल्मी पर्दे पर बिखरते सूफी संगीत को इसके जानकार भले ही रूहानियत से न जोड़कर सिर्फ मनोरंजन के एक साधन के तौर पर देखें, इसके बावजूद फिल्मों में बिखरते सूफी संगीत की इस छटा को सुनने वालों ने शुरू से ही दिल से पसंद किया है। एक तरफ जहां सूफी संगीत ने सरहदों को पार कर दिलों को जोड़ा है, वहीं यह भी सच है कि पारंपरिक कव्वाली के स्वरूप में भी कुछ बदलाव आज वक्त की जरूरत बन गए हैं। यही वजह है कि पारंपरिक कव्वालियों के स्वरूप में भी बदलते वक्त के साथ कई बदलाव किए गए हैं। करीब 800 साल के अपने इतिहास में कव्वाली ने सूफियों के समांऔर दरगाहों, खानकाहों तक का सफर तय किया है। अमीर खुसरो ने भारतीय संगीत और लोक भाषाओं का समायोजन करके कव्वाली को अपने समय की संगीत की एक विकसित और लोकप्रिय विधा के रूप में स्थापित किया। पहले जहां यह पारंपरिक वाद्ययंत्रों पर शब्दों की अदायगी के साथ सुरों पर सजती थी, वहीं आज इसमें नई तकनीक और संगीत का मिश्रण करके पेश किया जा रहा है। उस्ताद नुसरत फतेह अली खां के भतीजे और मशहूर कव्वाल मुअज्जम अली खां इस बात को मानते हैं और उनका कहना है कि आज का दौर बहुत आधुनिक होता जा रहा है और लोग हैवी म्यूजिक सुनना पसंद करने लगे हैं। इस वजह से हमने कुछ इंस्ट्रूमेंट्स इसमें जोड़े हैं। अपने लाइव शोज में हम इनको इस तरह से मिक्स करते हैं कि कव्वाली भी रहे और संगीत का कुछ अलग फ्यूजन भी इसमें हो। मुझे लगता है कि इस तरह से भी कव्वाली के जरिये अल्लाह का जो मैसेज सुनने वालों तक पहुंचाया जाता है, वह तो रहेगा ही। मगर एक नया बदलाव भी लोगों को पसंद आएगा।’ कव्वाली का नई तकनीक से संबंध 1925 में तब जुड़ना शुरू हुआ जब अपने समय के नामी कालू कव्वाल की आवाज को ग्रामोफोन पर रिकार्ड किया गया। यह सिलसिला चला तो कई और मशहूर कव्वालों ने भी इसे जारी रखा। इनमें शेख लाल, रघुनाथ यादव, मुहम्मद बशीर, अजीम प्रेम रागी, मुमताज हुसैन, स्वालेह मुहम्मद, इस्माइल आजाद की कव्वालियां लोगों में बहुत लोकप्रिय हुईं। उस समय की रिकार्डेड कव्वाली हाजी मलंग दूल्हा...काफी मशहूर हुई। इसके अलावा जॉनी बाबू कव्वाल की दमादम मस्त कलंदर’, अजीज नाजां की गुरु ख्वाजा मैं तोरी गली आई’, हाथरस के शंकर-शम्भू कव्वाल की जोड़ी की गायी महबूब किबरिया से मेरा सलाम कहनाआदि ने सुनने वालों के दिलों पर गहरा असर छोड़ा। इसी के बाद से कव्वालों की मशहूर जोड़ियों के नाम सामने आए। वारसी और साबरी बंधु की गायी छाप तिलक सब छीनी, ‘दमादम मस्त कलंदरजैसी कव्वालियों ने इन जोड़ियों को अलग पहचान दिलाई। वहीं कव्वाली के बादशाह कहे जाने वाले उस्ताद नुसरत फतेह अली खां ने भी कव्वाली में शास्त्रीय संगीत का संगम कर अभिनव प्रयोग किए।
बदलते दौर में आज कह सकते हैं कि कव्वाली की भी दो धाराएं हो गई हैं, एक पारंपरिक कव्वाली और दूसरी फिल्मी कव्वाली। हालांकि फिल्मों में आने के बाद पारंपरिक कव्वाली के स्वरूप में भी कुछ बदलाव आए हैं। वहीं, सौ सालों के फिल्मी सफर में भी कव्वाली की अहमियत से इंकार नहीं किया जा सकता। 1944 में पहली बार फिल्म नाइट बर्डके गाने में कव्वाली का अंदाज दिखा था। इसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा और तब से लेकर आज तक सूफी संगीत की तर्ज पर कई कव्वालियों ने सुनने वालों के मन को मोहा है। फिल्मों में कव्वाली को अलग अंदाज में संगीतबद्ध करने का श्रेय संगीतकार रोशन को जाता है। उनके संगीत से सजी न तो कारवां की तलाश हैऔर ये इश्क-इश्क हैजैसी कव्वालियां आज भी लोगों के जहन में ताजा हैं। वहीं आज की फिल्मों में कव्वाली एक खास आकर्षण के तौर पर प्रस्तुत की जा रही हैं। हैदराबाद के मशहूर कव्वाल वारसी बंधु नसीर अहमद खां वारसी जहां फिल्मी कव्वालियों को महज मनोरंजन का एक साधन मानते हैं। वहीं सूफी संगीत को युवाओं में लोकप्रिय बनाने वाले कैलाश खेर ऐसा नहीं मानते। उनके मुताबिक, ‘फिल्मी कव्वाली पारंपरिक कव्वाली की ही तर्ज पर बनाई जाती है। हालांकि इसका उद्देश्य जरूर अलग होता है। यह फिल्म की स्क्रिप्ट को ध्यान में रखते हुए तैयार की जाती है। मुक्तक कव्वालियां भक्त से भगवान की ओर या कह सकते हैं कि शिष्य से गुरु की ओर ले जाती हैं जो एक तरह से प्रशंसा के लिए, निर्गुण प्रेम के लिए होती हैं। पारंपरिक और फिल्मी कव्वाली की कोई तुलना नहीं की जा सकती। बदलते समय के साथ भाषा और वेशभूषा में जो बदलाव होता है, इसी तरह का बदलाव कव्वाली में भी हो रहा है। हमारे यहां संतों की धरती है। यहां कबीर हुए, अमीर खुसरो हुए। जिस गंगा-जमुनी तहजीब को इन संतों ने आगे बढ़ाया आज का हम सबका सूफी संगीत भी उसी का एक हिस्सा है। आज फिल्मों में सूफी संगीत का जो चलन है। इसे इस तरह कह सकते हैं कि कव्वाली का स्वरूप बदल कर फिल्मों में प्रयोग किया जा रहा है।
 फिल्मी कव्वालियों के अलावा मुकाबला कव्वालियों का भी चलन रहा है। यह कब से है यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन पारंपरिक कव्वाली विधा में महिला-पुरुष कव्वाली मुकाबले का निषेध है। इस बारे में मुअज्जम अली खां कहते हैं, ‘आज औरत और मर्द के बीच जो कव्वाली के मुकाबले होते हैं उनके बारे में मैं यही कहूंगा कि इसमें औरतों का इस तरह गाना मना है। कव्वाली को इबादत से जोड़कर देखा जाता है और इसकी महफिलों में अक्सर सूफी, औलिया मौजूद होते हैं। ऐसे में इन महफिलों में इस तरह के मुकाबले कैसे हो सकते हैं। महिलाओं का मंचों पर या रेडियो पर मर्दों के साथ गीत गाना तक तो ठीक है, सूफी संगीत में औरत-मर्द का मुकाबला करना, यह हमारे यहां नहीं होता। मैं खुद भी इस चीज को अच्छा नहीं समझता, क्योंकि इसमें अदब, एहतराम का और दीन, मजहब का भी एक लिहाज है, एक दायरा है।

‘न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’


‘न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’
 ‘मैं  गजल का आदमी हूं, गजल से मेरा जन्म-जन्म का साथ है, गजल का फन मेरा फन है और मेरा तजुर्बा गजल का तजुर्बा है।’ उनकी शख्सियत सरापा गजल लगती है और उनके यह लफ्ज सौ फीसद सच लगते हैं। पर आज यह गजल कुछ खामोश नजर आती है। उनकी खामोशी में खलल तभी पड़ता है, जब कोई उनकी गजल छेड़ दे। वक्त का इससे बड़ा सितम क्या होगा कि अल्फाज के जादूगर की जबान से आज लफ्ज नहीं निकलते और कभी चाहने वालों के हुजूम में घिरे रहने वाला शायर आज तन्हा है। यह हाल है आज मुहब्बतों के शायर बशीर बद्र का।
एक समय था कि बशीर बद्र मुशायरों की जान हुआ करते थे और शे'रो-सुखन की महफिलों में इतने मशगूल रहते थे कि घर पर कम ही समय दे पाते थे, आज वह उन महफिलों से दूर तन्हा हैं और उन्हें खुद की भी याद नहीं। याददाश्त के धागे कमजोर पड़ गये हैं और यादें धुंधली। ऐसे में साये की तरह उनके साथ हैं उनकी हमसफर डॉ. राहत बद्र। वह कहती हैं‘वह जब अपने चाहने वालों के बीच थे, हम तब भी उनके साथ थे और आज जब वह तन्हा हैं, हम तब भी उनका साथ निभा रहे हैं। एक हमसफर, शरीके-हयात को ऐसा ही होना चाहिए।’ यूं तो बशीर साहब ज्यादातर खामोश ही रहते हैं, लेकिन जब कोई उनकी कोई गजल छेड़ देता है, तो तरन्नुम उनके होठों पर भी इतराने लगता है। उनके जहन पर जमी धूल साफ होती जाती है और कुछ अशआर उनकी जबां पर भी आ जाते हैं। 

बशीर बद्र की पैदाइश अयोध्या में हुईबचपन कानपुर में बीता तो तालीम अलीगढ़ में मुकम्मल हुई। उनका गहरा ताल्लुक मेरठ से भी रहा है, लेकिन 1987 के साम्प्रदायिक दंगों में उनका न सिर्फ आशियाना ही खाक हुआ, बल्कि उन दंगों की आग ने उनके सुखनवर दिल को भी झुलसा कर रख दिया। तब उनके दिल से आवाज निकली थी, ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’ इन हालात से वह इतना हताश हुए कि मेरठ में अपने ढाई कमरों के मकान को छोड़ कर वह भोपाल के ईदगाह हिल्स में बस गये। अपने शहर से जुदाई ने उनके जज्बातों को गजल में ढाला और वह कह उठे, ‘कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से, यह नये मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।’
गालिब की तरह बशीर साहब के भी किसी उस्ताद का नाम सामने नहीं आया, मगर दंगों के माहौल में उठी आहों तो कभी मुल्क के बंटवारे में फैले दर्द भरे शोर ने उनके एहसासों, जज्बातों को गजल के रूप में उंडेल कर रख दिया। हादसों में गुजरी जिंदगी के बावजूद ‘दुश्मनी जम के करो लेकिन यह गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों’, कहते हुए उनकी गजल अमन का पैगाम लिए मुहब्बत को गुनगुनाती रही। बाद में उनका यही शे'र इतना मशहूर हुआ कि 1972 को हुए शिमला समझौते के वक्त पाकिस्तान के वजीरे-आजम जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी से मुखातिब होकर यही शे'र दोहराया था। कभी पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भी अपने आखिरी भाषण में बशीर साहब का ही शे’र, ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’, कह कर अपनी बात पूरी की थी
आज भी सियासत के मंदिर संसद में बशीर साहब के शे’र दोहराये जाते हैं। कभी विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड्गे उन्हीं के शे’र से अपनी बात की शुरुआत करते हैं, तो इसी शायराना लहजे में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भी उन्हीं के कलाम से अपने शब्दों को रवानी देते नजर आते हैं। आज गजल इस मकाम तक पहुंची है तो इसको आज के माहौल के मुताबिक ढालने में बशीर साहब की अहम भूमिका रही है। हालांकि शुरुआत में उन्होंने भी उर्दू, फारसी के बोझिल अल्फाज को अपनी शायरी में जगह दी। उनके गजल संग्रह ‘इकाई’ में गजल का यही रंग नजर आता है। मगर बाद में आसान लफ्जों की चाशनी उनके कलाम में बिखरी मिलती है और कहीं-कहीं अकबर इलाहाबादी की तर्ज पर अंग्रेजी के कुछ लफ्ज भी उनकी शायरी को संवारते नजर आते हैं। आज उनकी शायरी में मुहब्बत के रंग भी हैं, जवानी की उमंगें-जोश भी और यही वजह है कि उनका कलाम खासो-आम हर तबके में मशहूर है। उनकी तबियत जितनी खुश मिजाज है उनके शे'र उतने ही संजीदा और आसान जबान में, मगर सोचने पर मजबूर करने वाले। गजल के बारे में उनका अक्सर यही कहना रहा है कि ‘गजल में अगर सारी दुनिया के गमों को साथ लेकर चलने की सलाहियत नहीं है, तो मैं पहला आदमी हूँ, जो इन्हें गजल मानने से इंकार करता हूं।’ यह उनकी शायरी की खासियत है कि कहीं सियासत के रंग में रंगे उनके शे’र गूंजते हैं, तो कहीं युवाओं के चर्चों में उनकी मुहब्बत भरी गजल होती है। उनकी बेहद सादा शख्सियत के बावजूद उनके बारे में मशहूर रहा है कि वह अपनी तारीफ खुद ही करते रहते हैं। इस पर उनका जवाब भी सामने वाले को लाजवाब कर देता है, ‘सच यह है कि मैं अपने बारे में कम बोलता हूं। देश के हर पांचवे आदमी को मेरे शे’र याद हैं, ऐसे में मुझे बोलने की क्या जरूरत है, लेकिन दूसरा सच यह भी है कि 19वीं शताब्दी की जो गजल रवां-दवां है, उसकी शुरुआत मेरे ही चरागों से हुई है।’
कलम यूं ही नहीं संवरती। कितने ही गम दिल की जमीं पर खिलते हैं तब कोई गजल आबाद होती है। बशीर साहब की जिंदगी का सफर भी दुश्वारियों भरा रहा और इन्हीं दुश्वारियों ने उन्हें अल्फाज का जादूगर बना दिया, जिसका जादू सब पर छाया। प्रसिद्ध कवि और उनके दोस्त कन्हैया लाल नंदन उनकी आसान और सरल शब्दों की शायरी के दीवाने थे, तो गीतकार गुलजार उनके कद्रदानवहीं उनकी कई गजलों को अपनी आवाज से दे चुके मखमली आवाज के गायक जगजीत सिंह ने उनके कलाम के बारे में कहा था, ‘डॉ. बद्र सीधे शब्दों में लिखते हैं, सरल और सादा ज़बान इस्तेमाल करते हैं, इसलिए उनके शे’रों को धुनों में बांधना और डूबकर गाना अच्छा लगता है।’  अपने इस कलाम पर 1999 में उन्हें पद्म श्री और उर्दू के साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजा गया
अपनी जिंदगी के अहम पहलू पर बात करते हुए बशीर बद्र साहब की शरीके-हयात डॉ. राहत बद्र कहती हैं कि ‘हमारे बीच प्यार की एक वजह बशीर साहब की शायरी भी है। मैं उनकी शायरी को शादी से पहले से पसंद करती रही हूं और यही वजह है कि शादी के बाद उनसे अजनबियत नहीं लगी।’ आज बशीर साहब के चाहने वालों में आला दर्जे के लोगों से लेकर आम लोग तक शामिल हैं। इसी पर एक वाकिया याद करते हुए राहत बद्र बताती हैं की ‘एक बार बशीर साहब और मैं आइसक्रीम खाने गये थे। वहीं कुछ दूरी पर एक आदमी जूता सिल रहा था। मैंने बशीर साहब से कहा कि आप इनसे जूता पॉलिश करवा लें, इस बहाने उस आदमी को कुछ रूपये मिल जाएंगे। जैसे ही हम उसके पास गये, वह आदमी इनको पहचान गया और उठ कर खड़ा हो गया।’ बशीर बद्र तालीम के मामले में भी अव्वल रहे और उन्हें सर मॉरेस विलियम स्कॉलरशिप, डॉ. राधा कृष्ण जैसी स्कॉलरशिप भी मिलीं। इसी से जुड़ी एक अहम खासियत का जिक्र करते हुए राहत बद्र कहती हैं, ‘जब बशीर साहब ग्रेजुएशन करने अलीगढ़ गये, तो वहां वह पहले ही पढ़ाये जा रहे थे, यानी वहां के सिलेबस में उनकी गजल शामिल थी।’
खुद बशीर साहब का कहना है कि ‘आज के नौजवान शायर आसान जबान में गजल कहते हैं। यह कोई आसान काम नहीं है, लेकिन जरूरी काम है, क्योंकि पूरे हिन्दुस्तान में जिनमें हिन्दी वाले भी शामिल हैं, उनके लिए यह अल्फाज अजनबी नहीं हैं और यही आज की गजल की खूबी है।’ शहरों की जिंदगी के बारे में उनका एक शे’र मशहूर है, ‘है अजीब शहर की जिंदगी न सफर रहा न कयाम है, कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बदमिजाज सी शाम है।’ आज इसी बदमिजाज शाम में कोई खुशनुमा रंग घुला हुआ है तो वह उनकी शायरी ही है। उम्र के इस पड़ाव पर वह कुछ खामोश जरुर नजर आते हैं, मगर उनके चाहने वालों की तरह हजारों लफ्जों का कारवां उनके साथ है। वह कहते हैं की पूरी जिंदगी ख्याल है पर उसे गजल बनके आना पड़ेगा। मुझे यकीन हो गया है कि जिंदगी एक वाहिमा (तसव्वुर) है और जिंदगी कपड़े बदलती है।

पुरुष वर्चस्व को चुनौती


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कोनों-कुनबों में उजाला भरता दीया

रौशनी का कोई मजहब नहीं होता, त्योहारों की कोई जात नहीं होती। भारत जैसे देश में तो त्योहारों की खूबसूरती ही इनको साथ मिल कर मनाने से है, क्योंकि रौशनी के इस उत्सव दीवाली में बंदिशें नहीं, खुशियां बांटी जाती है। फिर कौन किस मजहब, पंथ का है इससे फर्क नहीं पड़ता। यह बात अलग है कि सियासत की जहर भरी हवा में माहौल कुछ देर के लिए कुछ धुंध से जरूर भर जाता है, लेकिन लाठी की मार से पानी कभी अलग हुआ करता है। भारतीय परिवेश पर भी यही बात पूरी तरह लागू होती है। यहां मौत का मातम हो या खुशियों का उत्सव सब मिल कर साथ मनाते आए हैं। कभी धर्म, मजहब बंदिश की तरह आड़े नहीं आते। यही वजह है कि चाहे इतिहास के पन्ने पलटें या आज पर नजर डालें यही नजर आता है कि दीवाली के दीयों में कुछ रौशनी उन घरों की भी शामिल होती है जिनके लिए श्रीराम भले ही ईश्वर के अवतार न हों, लेकिन एक अहम शख़्सियत जरूर हैं और मुस्लिम प्रजा उन्हें अपने राजा के तौर पर याद करके उनके स्वागत में चरागा करती आई है। दरअसल, यहां त्योहारों में शामिल होना एक परंपरा है और तहजीब का हिस्सा भी। यही वजह है कि यहां त्योहारों की खुशियां भी मिल कर ही मुकम्मल मानी जाती हैं।
उर्दू की मिठास से लबरेज रामायण की कथा को 1935 में मौलवी बादशाह हुसैन राणा लखनवी ने आसान शब्दों के साथ छंद में लिखा था। आज भी इस उर्दू रामायण को सुनने हर साल दूर-दूर से लोग बीकानेर पहुंचते हैं। दीवाली के दीयों की जगमग के बीच उर्दू की नफासत के साथ इस रामायण को सुनने का अपना ही मजा है।
किस कदर पुरलुत्फ है अंदाज तुलसी दास का,
यह नमूना है गुसाई के लतीफ अंदाज का,
नक्शा रामायण में किस खूबी से खींचा,
राम के चौदह साल वनवास का।
तुलसी दास की रामायण से अलग उर्दू रामायण की इन पंक्तियों से हिंदुस्तान के वजूद की एक ऐसी सच्ची तस्वीर झांकती दिखती है जिसमें हिंदू-मुस्लिम एकता के खूबसूरत रंग नजर आते हैं। इसे एक अच्छा संकेत कह सकते हैं कि हर दीवाली पर इस रामायण को सुनने का एक रिवाज भी बन गया है। आज भी जब रौशनी के इस पर्व पर रौशनी मेहमान बन कर जगमगाती है, तो इसके लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, अपना-पराया नहीं होता। यह खुशियों की सूरत लिए दीए की तरह टिमटिमाती है। कहा जाता है कि मुगल शासक बाबर ने भी दीवाली को एक खुशी का मौकाके तौर पर न सिर्फ मान्यता दी थी, बल्कि वह दीवाली के उत्सव में शामिल भी होते थे। आगे चलकर यही एक परंपरा बन गई और हुमायूं से लेकर बहादुर शाह जफर तक यह परंपरा बनी रही। यही वजह है कि रौशनी की यह बेला कभी कलमकारों की कलम का विषय बनी है, तो कभी शायरों के कलाम में इसकी अहमियत नजर आई है। रौशनी के इस त्योहार की जगमगाहट से न तो नजीर ही बच सके और न ही जोश मलीहाबादी। जोश ने अपनी आत्मकथा में दीवाली के त्योहार की जो मंजरकशी की है, वह बताती है कि उनके समय में भी दीवाली किसी एक दायरे में कैद न होकर मुस्लिमों के आंगन तक दीयों के रूप में जगमगाती नजर आती रही है। ऐसे में वे अपनी आत्मकथा में भी इसका जिक्र करना भूले नहीं हैं। वह लिखते हैं, ‘बचपन में किस तरह दीवाली में धूम-धड़ाका हुआ करता था। गट्टे और मिठाई के हसीन और बारीक खिलौने बड़े सलीके के साथ हर तरफ चुन दिये जाते थे। शाम होते ही पहले उन घरौंदों और फिर पूरे मकान में चराग जलाए जाते थे और हर कोना जगमगाने लगता था और ऐन उसी वक्त जबकि चरागों की पलकें झपकाती रौशनी में खालिस घी के चरागों के नाचते धुएं की खुश्बू हवा में तैरने लगती थी। उसी वक्त हमारे बड़े दालान में ढोलक पर थाप पड़ती और डोमनियां, मिरासें गाना शुरू कर दिया करती थीं, ‘आई दीवाली, आई दीवाली, मदमाती यौवन वाली। आई दीवाली, आई दीवाली।
18वीं सदी के मशहूर शायर नजीर अकबराबादी ने शायरी की आम परंपरा से अलग आसान शब्दों में हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने वाली नज्में कही। उन्होंने आम आदमी को अपनी नज्मों का विषय बनाया। फिर चाहे मौसम की बात हो या होली, दीवाली जैसे त्योहारों की। उन्होंने इन्हें दिलचस्प अंदाज में कलमबंद किया। दीवाली की रौनक को उन्होंने कुछ इस तरह शब्दों में पिरोया-
हर इक मकां में जला फिर दीया दीवाली का,
हर इक तरफ को उजाला हुआ दीवाली का,
सभी के दिल में समा भा गया दीवाली का,
किसी के दिल को मजा खुश लगा दीवाली का,
अजब बहार का है दिन बना दीवाली का।।
आजादी की मुहिम के गवाह और गंगा-जमुनी तहजीब का केंद्र रहे कानपुर में आज भी परंपरा के तौर पर हिंदुओं के साथ मुसलमान भी दीवाली के दीयों से पूरे इलाके को रौशन करते हैं। 1876 में इस परंपरा की नींव दरअसल अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह जताने के तौर पर पड़ी थी। तब दीवाली में मुस्लिमों ने हिंदुओं के साथ मिल कर दीए जलाए थे और जंग का ऐलान किया था। तब से यह आज तक एक परंपरा के तौर पर कायम है। दरअसल, दीवाली खुशियों का एक ऐसा उत्सव है जिसमें दीयों की जगमग में अंधेरे के अंत का संदेश है, तो खुशियों की मिठास में कड़ुवाहट को जगह न दिए जाने का सबक भी। 

Sunday, 14 April 2013

आय कम रोज़गार कम, अनाज कम तो बच्चे भी कम!


कम आमदनी में ख़र्च कम कर देने का फ़ण्डा अगर परिवार के बजट के लिए फ़ायदेमन्द है तो लोकतन्त्र की माली हालत में भी सुधार जनसंख्या को न बढ़ा कर किया जा सकता है। आय कम तो ख़र्च कम जैसी नीति रोज़गार, रोटी, पर भी लागू होनी चाहिए कि रोज़गार कम, अनाज कम तो बच्चे भी कम।
जिस देश में दुनिया के सबसे ज़्यादा भूखे हों, बिहार, उड़ीसा, बंगाल जैसे राज्यों में लोग सिर्फ़ भरपेट रोटी के लिए अपने बच्चों को बेचने पर मजबूर हों, वहाँ ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों को जन्म देना ईश्वरीय वरदान किस तरह ठहराया जा सकता है! इस मुल्क की बदनसीबी कि इस देश में राजनेताओं की शक्ल में कूटनीतिज्ञ बहुत हैं लेकिन मुल्क के बारे में सोचने-करने वाले सच्चे सेवक कम। यही वजह है कि कम बच्चे पैदा करने की बात कोई राजनेता नहीं करता। ग़रीबी की रेखा से नीचे जीने वाले लोगों को तरह-तरह के राशन-कार्ड तो थमा दिए जाते हैं, बच्चों को श्रम से बचाने को स्कूलों में दोपहर का खाना और रुपये तो मुहैया कराए जाते हैं लेकिन लोगों से दो से ज़्यादा बच्चे पैदा न करने की बात कहकर इस बदहाली को ही ख़त्म करने की नींव नहीं डाली जाती जो कि एक स्थायी समाधान है, बेरोज़गारी, मुफ़लिसी से पार पाने का और अगर यह आज मज़बूती से लागू हो तो अगले पचास सालों में देश की माली हालत में तेज़ी से सुधार देखने को मिलेगा। चीन की आबादी हिन्दुस्तान से ज़्यादा है और उसके कड़े क़ानून के आगे लोग कम बच्चे पैदा करने को मजबूर हैं और यही वजह है कि वह तरक्की पर तरक्की कर माली तौर पर मज़बूत हो रहा है और हमारा मुल्क 2036 तक आबादी के लिहाज़ से चीन से भी दोबाला हो जाएगा। यह खु़शी की बात है कि इस बार के उत्तराखण्ड के निकाय चुनाव में चुनाव आयोग ने यह फ़ैसला राज्य में लागू कर दिया है कि 27 अप्रैल 2003 के बाद दो से ज़्यादा बच्चों वाले लोग चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराए जाएंगे। यही अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में भी लागू हो तो हालात और बेहतर होने की उम्मीद है। ऐसे में जनता को न सिर्फ़ अच्छा संदेश जाएगा बल्कि जनता पर भी यही बात सरकारी सेवाओं के तौर पर लागू की जा सकती है। थोड़ी जागरुकता, थोड़ा अंकुश देश की आबादी को नियन्त्रित करने का ज़रिया बन सकते हैं।
अफ़सोस लोकतन्त्र में वोटों के खिसक जाने के डर से राजनेता कम बच्चे पैदा करने की बात को अपने चुनावी भाषण का हिस्सा नहीं बनाते क्योंकि वहाँ वोट अहम हो जाते हैं देश की भलाई का मुद्दा हल्का पड़ जाता है फिर अगर एक पार्टी इस मुद्दे को छूएगी तो दूसरी इसकी मुख़ालफ़त कर वोट हथियाने की फि़राक़ में रहेगी। इसके पीछे एक कारण शायद संजय गाँधी के जबरिया अभियान की आलोचना रही हो लेकिन कड़ुवी सच्चाई यह है कि नेताओं के अपने बच्चे ही दो से ज़्यादा हैं, ऐसे में वह आबादी को काबू रखने की बात जनता से किस मुँह से कहें! यह तो जनता को समझना चाहिए कि उसे आने वाली पीढ़ी को बेरोज़गारी, अनाज-पानी की कमी और चिडि़या जैसे रिहाइशी घर देने हैं या एक अच्छा जीवन!

Friday, 21 September 2012

डायन सरकारें

ग़रीब 6 ही सिलेण्डर साल भर में इस्तेमाल करते हैं, यह तर्क अपने भाषण में माननीय प्रधानमंत्री ने व्यक्त किया। उनसे ज़्यादा ग़रीबों के हालात के बारे में और कौन जान सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री जिस आयोग के अध्यक्ष हैं उसी से कुछ दिन पहले एक बयान जारी हुआ था कि 26 या 28 रुपये रोज़ कमाने वाला ग़रीबी की रेखा से ऊपर है यानि वह ग़रीब नहीं है। दूसरा तर्क पीएम का यह भी ध्यान देने के काबिल है कि पैसे पेड़ों पर नहीं उगते। माननीय पीएम को यह तो खुद समझना चाहिए क्योंकि जिस तरह से उनके मंत्री और सांसद जनता के रुपयों की बर्बादी करते रहे हैं उससे तो यही लगता है कि सरकार कोई भी रही हो सबके लिए जनता रुपयों का एक पेड़ ज़्यादा साबित होती रही है। आज़ादी के समय एक पत्रिका के सम्पादकीय में यह विचार छपे थे कि 1857 और उसके बाद का जो विद्रोह और संघर्ष भारतीय जनता ने किया वह इसलिए हुआ था कि उनको दो वक्त की रोटी मिलनी भी मुश्किल होने लगी थी यानि वह संघर्ष रोटी के लिए हुआ था। आज भी रोटी आम आदमी से दूर होती जा रही है। खाने के सामान महंगे, ईंधन महंगा, रोज़गार की कि़ल्लत। यह सब आम आदमी के आक्रोश को बढ़ाने में मद्दगार साबित हो रहे हैं। सोचने वाली बात है कि जिस जनता के लिए जि़न्दगी दिन-ब-दिन दूभर होती जा रही है और सरकार हर महंगाई पर मजबूरी और आर्थिक हालात सुधारने का तर्क देकर अपना पल्ला झाड़ कर अलग हो जाती है उसी सरकार के मंत्री साल में 70-80 सिलेण्डर सिर्फ़ अपनी पार्टियों पर ख़त्म कर देते हैं। इस देश में जहाँ करीब डेढ़ सौ रुपयों में एक बेबस माँ अपने तीन बच्चों को महज़ चन्द वक्त की रोटी मुहैया होने के एवज़ में बेच देती है वहाँ रोज़ के हिसाब से लाखों रुपयें सिर्फ़ विदेशों की यात्राओं और आलीशान होटलों में ठहरने के लिए मंत्री फूंक डालते हैं। यह कैसी डायन सरकारें हैं जो अपनी जनता नाम की औलाद को ही निगल रही है।